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अहितकर के प्रति क्रोध व्यर्थ
विराधक: कथं हन्त्रे जनाय परिकुप्यति ।
त्र्यङ्गुलं पातयन् पद्भ्यां स्वयं दण्डेन पात्यते ॥१०॥
अपराधी जन क्यों करे, हन्ता जनपर क्रोध।
दो पग अंगुल महि नमे, आपहि गिरत अबोध ॥१०॥
अर्थ: जो जीव सदा दूसरों का अपकार ही करता है, उसके साथ जब कोई अन्य बुरा करे तो वह क्रोधित क्यों होता है? क्योंकि संसार में यह रीति है कि जो किसी को सुख या दुःख पहुँचाता है वह उसके द्वारा सुख या दुःख को प्राप्त करता है और यही कर्मों की व्यवस्थित व्यवस्था है।
जिसप्रकार बिना विचार किए काम करने वाला पुरुष सफाई में उपयोग में लिये जाने वाले त्र्यंगुल यंत्र को जमीन पर गिरा देता है। परन्तु उस पर पैर पडने से वह बिना किसी प्रयत्न के ऊपर उठता हुआ उस पुरुष को ही गिरा देता है। यही सत्य है कि अहित करने वाला व्यक्ति दूसरे के साथ-साथ अपना भी अहित ही करता है अतः हित के इच्छुक बुद्धिमान पुरुषों को उनसे द्वेष नहीं करना चाहिये।
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Gatha