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Title

Ishtopdesh Gatha 09

संसारी जीव का कुटुम्ब परिवार कैसा है?

दिग्देशेभ्यः खगा एत्य संवसन्ति नगे नगे ।

स्वस्वकार्यवशाद्यान्ति देशे दिक्षु प्रगे प्रगे ॥ ९ ॥

दिशा देश से आयकर, पक्षी वृक्ष बसन्त।

प्रात होत निज कार्यवश, इच्छित देश उड़न्त ॥९॥

अर्थ: जिसप्रकार भिन्न-भिन्न दिशाओं व देशों से उडकर पक्षीगण वृक्षों पर आ बैठते हैं, रात रहने तक वहीं बसेरा करते हैं और सुबह होने पर फिर से अनिश्चित दिशा व देश की ओर उड जाते हैं। उनका ऐसा कोई नियम तो नहीं कि जिस दिशा से आये हैं उसी ओर वापिस जायें। ऐसी ही दशा संसारी जीवों की है। कर्मोदय से यह जीव नरकादि गतियों से आकर एक कुल में अपनी आयु प्रमाण रहता है और कर्म के ही अनुसार आयु पूर्ण होने पर भिन्न -भिन्न गतियों की ओर बढ जाता है।

हे जीव! जब यह वास्तविकता तुझे ज्ञात होती है तो क्यों इन क्षणभर के संयोगों के लिये पूरा जीवन कषाय आदि विभाव भावों में व्यतीत कर देता है। ऐसा न समझ कि ये तेरे द्वारा एकत्रित है अपितु ये तो स्वयं ही आये थे और स्वयं ही चले जायेंगे। अतः मोहनीय पिशाच के आवेश को दूर हटाकर स्वरूप को देखने की चेष्टा कर!

Series

Ishtopdesh

Category

Paintings

Medium

Acrylic on Canvas

Size

36" x 48"

Orientation

Landscape

Artist

Manoj Sakale

Completion Year

01-May-2023

Gatha

9