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Title

Ishtopdesh Gatha 47

आत्मध्यान ही सुख का कारण

आत्मानुष्ठाननिष्ठस्य व्यवहारबहिः स्थितेः ।

जायते परमानन्दः कश्चिद्योगेन योगिनः ॥४७॥

ग्रहण त्याग से शून्य जो, निज आतम लवलीन।

योगीको हो ध्यान से, कोइ परमानन्द नवीन ॥४७॥

अर्थः चाहे मनुष्यकृत इन्द्रिय भोग हों अथवा स्वर्गगत दिव्य सामग्री, योगिजन देहाश्रित सुख में कदापि बंध को प्राप्त नहीं होते। वे तो देह से निवृत अपनी आत्मा में ही स्थित रहने वाले हैं, उनके व्यवहार में भी प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं अपितु स्वात्मवित्ति ही है। ऐसे योगी पुरुष को आत्मध्यान द्वारा वचनों से अगोचर परम, जो दूसरों को नहीं हो सकता ऐसा नवीन आनन्द उत्पन्न होता है।

Series

Ishtopdesh

Category

Paintings

Medium

Acrylic on Canvas

Size

48" x 36"

Orientation

Landscape

Artist

Manoj Sakale

Completion Year

01-May-2023

Gatha

47