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अज्ञानता हानिकारक है
अविद्वान् पुद्गलद्रव्यं योऽभिनन्दति तस्य तत् ।
न जातु जन्तो: सामीप्यं चतुर्गतिषु मुञ्चति ॥४६॥
पुद्गल को निज जानकर, अज्ञानी रमजाय।
चहुँगति में ता संगको, पुद्गल नहीं तजाय ॥४६॥
अर्थः कदाचित कोई शरीर को ही अपना माने तो उसमें हानि क्या है? ऐसी जिज्ञासा कभी हो तो विचारना कि जो हेय-उपादेय तत्त्वों को तो नहीं जानता, शरीरादिक पुद्गल को आत्मरूप और आत्मा को पुद्गलरूप मानता है उस जीव के साथ नरकादिक चार गतियों में वह पुद्गल अपना संबंध नहीं छोडता। अर्थात वह प्रत्येक भव में पुद्गल के साथ ही संबंध करेगा, कभी उससे मुक्त नहीं हो सकेगा।
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Gatha