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भेदज्ञान की प्रेरणा
एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः ।
बाह्याः संयोगजा भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥२७॥
मैं इक निर्मम शुद्ध हूँ, ज्ञानी योगीगम्य।
कर्मोदय से भाव सब, मोतें पूर्ण अगम्य ॥२७॥
अर्थः जैसे मोती में पिरोया हुआ डोरा धारावाही है उसीप्रकार प्रत्येक अवस्था में मैं सामान्य रूप से धारावाही हूँ अतः हे पुरुषार्थवन्त जीव! यह निर्धारण कर! मैं एक हूँ, निर्मम अर्थात मोह रहित शुद्धात्मा हूँ, कर्मादिक से भिन्न अनन्त सर्वज्ञ परमात्माओं के प्रत्यक्ष ज्ञान में व श्रुतकेवलियों द्वारा शुद्धोपयोग मात्र रूप से जानने में आने वाला चिन्मय स्वभाव जीव तत्त्व हूँ। ये देहादिक जितने भी संयोगजन्य पदार्थ हैं, वे मेरे अस्तित्व में रंचमात्र भी प्रवेश नहीं करते, वे मुझसे सर्वथा (द्रव्य से, गुण से, पर्याय से) भिन्न है।
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Gatha