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Title

Ishtopdesh Gatha 25

आत्मा ही ध्यान है

कटस्य कर्त्ताहमिति सम्बन्धः स्याद् द्वयोर्द्वयोः ।

ध्यानं ध्येयं यदात्मैव सम्बन्धः कीदृशस्तदा ॥ २५ ॥

'कट का मैं कर्तार हूँ' यह द्विष्ठ सम्बन्ध।

आप हि ध्याता ध्येय जहँ, कैसे भिन्न सम्बन्ध ॥२५॥

अर्थः हे जीव! बाँस की खपच्चियों और जल से चटाई बनाने वाला भी यही कहता है कि “मैं चटाई को बनाने वाला हूँ।” यहाँ बनाने वाला “मैं” जुदा हूँ और बनने वाली “चटाई” जुदी है। कर्ता-कर्म का व्यवहार संबंध तो दो के मध्य ही होगा लेकिन यदि कोई संबंध के उपचार को ना समझकर उसे ही परमार्थ मान ले तो वह सदा आकुलित रहेगा।

उसीप्रकार ध्यान अवस्था में तो आत्मा ही ध्याता, आत्मा ही ध्यान और आत्मा ही ध्येय हो जाता है, वहाँ कर्मादिक का कोई संबंध नहीं, तब छूटना किसका? यही परमार्थ है।

Series

Ishtopdesh

Category

Paintings

Medium

Acrylic on Canvas

Size

36" x 48"

Orientation

Portrait

Artist

Manoj Sakale

Completion Year

01-May-2023

Gatha

25