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यथार्थ वैयावृत्ति
अज्ञानोपास्तिरज्ञानं ज्ञानं ज्ञानिसमाश्रयः ।
ददाति यत्तु यस्यास्ति सुप्रसिद्धमिदं वचः ॥२३॥
अज्ञ-भक्ति अज्ञान को, ज्ञान-भक्ति दे ज्ञान।
लोकोक्ती जो जो धरे, करे सो ताको दान ॥२३॥
अर्थः हे भव्य! जीव का सबसे बडा दोष उसका मोह जनित अज्ञान ही है। अज्ञानता के दो अर्थ हैं; एक तो ज्ञानरहित देह में आत्मबुद्धि रूप अज्ञान और दूसरा मोह भ्रान्ति सहित गुरुओं की सेवा रूप अज्ञान। यह बात प्रसिद्ध है, कि जिसके पास जो कुछ होता है वह उसी को देता है, जो उसके पास है नहीं वह दूसरे को कहाँ से देगा? अतः हे भद्र! ज्ञान एवं ज्ञानी की ही उपासना करना योग्य है। ज्ञान होने का फल तो स्वभाव की निर्मलता है, यदि वह प्राप्त ना हो तो ज्ञान पाकर भी जीव अज्ञानी ही है।
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Gatha