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वेदनीय कर्म –
विषयसुख सो दुःख है, निश्चयनय परमाण।
धर्मदास क्षुल्लक कहे, समझ देख मतिमान॥
जिसप्रकार यदि कोई व्यक्ति अत्यंत धारदार तलवार पर शहद लगाकर उसे जिह्वा से चाटे, वहाँ उसे शहद की मिठास का अवश्य ही थोडा स्वाद आयेगा, परन्तु निश्चित ही तलवार की धार से जिह्वा के कटने पर विशेष दु:ख भासित होगा, पीडा होगी। ये विषयसुख भी इसीप्रकार के दु: ख के जनक हैं।
एक वेदनीय कर्म का, भेद दोय परकार।
धर्मदास क्षुल्लक कहै, सातासात विचार॥
निश्चय से तो ये शुभ-अशुभ अथवा साता-असाता जीव के है नही, विषय सुख ने कभी जीव-आत्मा में प्रवेश किया नही। जीव तो सदा अपने ज्ञायक में ही स्थापित है, कर्म तो जड है।
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