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हे आत्मन् ! कृमियों के सैकड़ों जालों से भरा हुआ और नित्य जर्जरित होता यह देह रूपी पिंजरा, इसके नष्ट होने से तुम भय मत करना; क्यों कि तुम तो ज्ञान शरीरी हो।
क्रमांक १९७. मृत्यु महोत्सव
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Bol