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सम्पत्ति, पुत्र और स्त्री आदि पदार्थ ऊंचे पर्वत के शिखर पर स्थित तथा वायु से चलायमान दीपक के समान शीघ्र ही नष्ट होनेवाले हैं तथापि जो मनुष्य उनके सम्बन्ध में स्थिरता का अभिमान करते हैं वे मानों मुट्ठी से आकाश का नाश करते हैं अथवा व्याकुल होकर सूखी नदी में तैरते हैं अथवा तृषा से पीड़ित होकर प्रमादयुक्त होते हुए रेती को पीते हैं।
क्रमांक ४०. श्री पद्मनन्दि पंचविंशति
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Bol