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हे भाई ! अपनी दृष्टि के सामने तू क्या नहीं देखता कि यह जगत कालरूपी प्रचण्ड पवन से निर्मूल हो रहा है! भ्रान्ति को छोड़ ! जगत में किसी की नाममात्र भी स्थिरता नहीं है। जिस दिनका मंगलमय प्रभात उगता है, वही दिवस अस्तपने को प्राप्त होता है। भाई ! इस जगत का स्वभाव ही क्षणभंगुर है! पर्वत समान विस्तीर्ण लगनेवाले रूपों का घड़ीभर में अवशेष भी दिखायी नहीं देता? कौन जाने किस कारण से तू इस इन्द्रजालवत् जगत के इष्ट पदार्थों में आशा बाँधकर भटकता रहता है।
क्रमांक ९. श्री आत्मानुशासन
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Bol