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संसार भवन में रत्नत्रय
भेदज्ञान से भ्रम गयो, नहीं रही कुछ आश।
धर्मदास क्षुल्लक लिखै, अब तोड मोह की पाश॥
जिसप्रकार अंधेरे भवन में रत्न खो गया हो और कोई पुरुष रत्नप्राप्ति की इच्छा से हाथ में दीपक लेकर रत्न ढूंढने निकले तो निश्चित ही उसे रत्न मिल सकता है, उसीप्रकार इस संसार में भ्रम रूपी अंधकार चहुँ ओर है, उसमें रत्नत्रय रूपी रत्न खो गया है, यदि जीवस्वभाव सम्यग्ज्ञान रूपी दीपक की सहायता से उसे ढूंढे तो उसे वह अवश्य ही प्राप्त होगा।
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