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Title

Bhedgyan

भेदज्ञान

भेदज्ञान साबू भयो, समरस निर्मल नीर।

धोबी अंतर आत्मा, धोवै निज गुण-चीर॥

जिसप्रकार धोबी निर्मल जल से भरे हुए तालाब में वस्त्र धोता है, वहाँ प्यास लगने पर वह मूर्ख धोबी विचार करता है कि ये दो वस्त्र धोने के बाद जल पीऊँगा, परन्तु एक वस्त्र धोने के बाद फिर भी यही विचार किया कि ये धोने के बाद पीऊँगा, ये धोने के बाद पीऊँगा, इसीप्रकार लगातार संकल्प-विचार करता करता वह धोबी निर्मल नीर में रहते हुए भी निर्मल नीर में ही मर गया, परन्तु जल नहीं पिया। वैसे ही जगत के सर्व जीव निर्मल सम्यग्ज्ञानमयी जल से भरे हुए समुद्र में मात्र पर वस्तु को उज्जवल करते हैं और विचार करते हैं कि यह करने के बाद गुरु के उपदेश द्वारा सम्यग्ज्ञानरूपी जल पीकर सुखी होऊँगा, यह करने के बाद गुरु के उपदेश द्वारा सम्यग्ज्ञानरूपी जल पीकर सुखी होऊँगा परन्तु ऐसा करते-करते समय पूर्ण हो जाता है और वे ना-जाने मरकर कहाँ से कहाँ चले जाते हैं।

Series

Samyakgyan Deepika

Category

Paintings

Medium

Charcoal on Paper

Size

24" x 30"

Orientation

Landscape

Artist

Yuvraj Patil

Completion Year

10-Jun-2019