Title
गोत्रकर्म
गोत्रादिक सब कर्मको, त्याग भये जिनराज।
धर्मदास क्षुल्लक कहै, वंदन सुखके काज॥
जिसप्रकार घडे का निर्माता कुम्हार मिट्टी, दण्ड, चक्र इत्यादि द्वारा मिट्टी के छोटे-बडे बर्तन बनाता है, उसीप्रकार इस गोत्रकर्म के द्वारा जीव उच्च-नीच गोत्र को प्राप्त होता है। परन्तु वास्तव में तो आत्मा को कोई गोत्र नहीं, वह तो इनसे भिन्न है।
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