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चतुर्थ काल में जब भोगभूमि का अंत होकर कर्मभूमि का प्रारंभ होता है तब इस धरा पर क्रमशः चौबीस तार्थंकरों का जन्म होता है, जो सभी को मुक्तिमार्ग का उपदेश देकर मोक्ष पुरुषार्थ की प्रेरणा देते हैं। उन्ही तीर्थंकरों के जन्म के अवसर पर सौधर्म इन्द्र समस्त देवगण के साथ स्वर्गलोक से इस धरा पर आते हैं और उनकी समस्त व्यवस्था करते हैं, जब सौधर्म इन्द्र इस भूमि पर आते हैं तो वे अपने आधीन एक देव को आज्ञा देते हैं जो विक्रिया से स्वयं को ऐरावत हाथी बना लेता है। वह ऐरावत हाथी अत्यंत विशाल, श्वेत एवं अति सुन्दर आभा को धारण करने वाला होता है। इस ऐरावत हाथी के आठ विशाल दाँत होते हैं, शक्ति में स्वयं यह पर्वत की भाँति बलशाली होता है, आकाश में गमन करने की शक्ति से युक्त इस हाथी के बत्तीस मुख होते हैं, प्रत्येक मुख के चार दाँत, प्रत्येक दात पर एक सरोवर होता है। प्रत्येक सरोवर में एक कमलिनी और प्रत्येक कमलिनी पर बत्तीसी कमल होते हैं। प्रत्येक कमल में बत्तीसी दल होते हैं और प्रत्येक दल पर अपसरायें नृत्य करती हैं। वास्तव में इस हाथी की शोभा समस्त स्वर्ग लोक की परिचायक है। तीन लोक के नाथ इस हाथी पर विराजमान होकर सुमेरु पर्वत पर जाते हैं, जहाँ इन्द्र स्वयं १००८ कलशों से उनका अभिषेक करता है।
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